Sunday, March 30, 2025

rago ka samay siddhant in hindi

रागों का समय सिद्धांत  

भूमिका: भारतीय संगीत की यह निजी विशेषता है कि इसके रागों को उनके निश्चित समय पर ही गाया बजाया जाता है क्योंकि प्राचीन ग्रंथकारो ने यह अनुभव किया है कि राग अपने निश्चित समय पर गाए जाने पर ही मधुर लगते हैं। 

नियम: रागों को समय अनुसार गाए जाने के तीन नियम बनाए गए हैं —
1. पूर्वांगवादी और उत्तरांगवादी रागों का नियम
2. संधिप्रकाश तथा उसके बाद गाए जाने वाले रागों का नियम 
3. अध्वदर्शक स्वरो का नियम 

1. पूर्वांगवादी और उत्तरांगवादी रागों का नियम: इस नियम के अनुसार सप्तक के स्वरों को दो भागों में बाँटा जाता है ।
i) स, रे, ग, म (पूर्वांग)
ii) दूसरा भाग- प, ध, नि, स (उत्तरांग)

जिन रागों का वादी स्वर सप्तक के पहले भाग में से है वे पूर्वांगवादी राग कहलाते है। इन्हें दिन के 12 बजे से रात्री के 12 बजे तक गाया -बजाया जाता है। 

जिन रागों का वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में से हैं वे उत्तरांगवादी राग कहलाते है। ऐसे रागों को रात्रि के 12 बजे सै दिन के 12 बजे तक गाया -बजाया जाता है। 

2. संधिप्रकाश व (तथा) उसके बाद गाए बजाए जाने वाले रागों का नियम:  इस नियम के अनुसार रागो को स्वरो के आधार पर तीन भागों में बांटा गया है –
i) रे,ध कोमल स्वरो वाले राग
ii) रे,ध शुद्ध स्वरो वाले राग
iii) ग, नि कोमल स्वरो वाले राग

i) रे,ध कोमल स्वरो वाले राग: जिन रागों में रे, ध स्वर कोमल लगते हैं उन्हे सुबह व शाम 4 से 7 बजे के बीच गाया बजाया जाता है। इन्हें संधिप्रकाश राग कहते है क्योंकि ये दिन और रात के संधि समय में गाए बजाए जाते है। जैसे: भैरव, भैरवी, बसंत, पूर्वी आदि। 

ii) रे,ध शुद्ध स्वरो वाले राग: जिन रागो मे रे,ध स्वर शुद्ध लगते है, उन्हे सुबह व शाम 7 से 10 बजे के बीच गाया बजाया जाता है। जैसे: राग बिलावल, राग कामोद,  केदार आदि। 

iii) ग, नि कोमल स्वरो वाले राग: जिन रागो मे ग, नि स्वर कोमल लगते हैं उन्हें सुबह व शाम 10 से 4 बजे के बीच गाया बजाया जाता है। जैसे: राग आसावरी आदि। 

उपरोक्त नियम सभी रागो पर लागू नहीं होते है। बहुत से ऐसे राग है जो इन नियमों का उल्लंघन करते है। जैसे:- तोड़ी, भैरवी 

3. अध्वदर्शक स्वरो का नियम: रागों के समय निर्धारण में अध्वदर्शक स्वर की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। “म” स्वर को अध्वदर्शक स्वर कहा गया है। इसके दो रूप है।

i) जिन रागो में ‘म’ स्वर शुद्ध लगता है वे राग प्रातः (सुबह) गाए जाते है। जैसे:- राग भैरव 

ii) जिन रागो में ‘म’ स्वर तीव्र लगता है वे राग रात्रि में गाए बजाए जाते है। जैसे: राग केदार 

4. मौसमी राग: इन नियमो के अतिरिक्त बहुत से राग ऐसे हे जो ऋतुकालीन की श्रेणी में आते हैं। ऐसे रागो को उनके निश्चित मौसम में गाया बजाया जाता है। जैसे: मल्हार राग, जो वर्षा ऋतु में गाया बजाया जाता है। बसंत राग, बसंत ऋतु में। 

सारांश: कुछ विद्वान मानते है कि रागों का समय सिद्धांत वैज्ञानिक नहीं है इसलिए रागों को समय सिद्धांत के बंधन के रूप में न बाँधकर मन का रंजन करने वाला होना चाहिए। अतः अलग-अलग स्वरो वाले राग अलग-अलग समय पर मनुष्य की भावना को व्यक्त करने में सहायक है। चाहे हम लाख बार इनकी आलोचना करे। परंतु इस नियम में रह कर ही हमे आनंद मिलता है। 


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