Thursday, 13 March 2025

मियाँ तानसेन miyan tansen

 मियाँ तानसेन

भूमिका:- मियाँ तानसेन का नाम संगीत जगत में ही नहीं बल्कि लोक मात्र में संगीत का प्रतीक बन गया है। तानसेन जी के बारे मे अनेक कहानियाँ प्रचलित है। उनके जीवन के बारे में जो एतिहासिक जानकारी मिलती है, वो इस प्रकार है- 

1. जन्म: तानसेन जी का जन्म 1492-93 के बीच में माना गया है। आपका जन्म ग्वालियर के बेहट नामक स्थान पर मकरन्द पांडे के घर हुआ। कई विद्-वानो ने इनका नाम ‘तन्ना मिश्र’ लिखा है।

2. शिक्षा: बचपन से नटखट तन्ना विभिन्न जानवरों की तथा पशु-पक्षियों की आवाजों की हूबहू नकल उतार लेते थे। एक बार स्वामी हरिदास तथा उनके शिष्य टोली जब जंगल से गुजर रही थी तो उन्होंने शेर की दहाड़ निकाल कर उन्हें बुरी तरह से डरा दिया था। स्वामी हरिदास बालक तन्ना की प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इन्हें इनके पिता से संगीत सिखाने के लिए मांग लिया। 10 वर्षो तक संगीत की शिक्षा दी।

इसके पश्चात आप ग्वालियर में फकीर ‘मोहम्मद गैस’ के पास रहने लगे जहाँ आपका परिचय राजा मान सिंह विधवा रानी मृगनयनी से हुआ। रानी आपके संगीत से से बहुत प्रभावित थी। उन्होने अपनी प्रिय दासी हुसैनी से तानसेन की शादी करवा दी। 

3. संगीतज्ञ के रूप में: तानसेन रीवा नरेश राजा राम चन्द्र के दरबारी गायक बन गए। राजा की प्रशंसा में आपने अनेक ध्रुपद भी रचे। अकबर के अनुरोध पर राजा राम चन्द्र को इन्हें सम्राट अकबर के दरबार में भेजना पड़ा। अकबर स्वंय एक महान संगीत प्रेमी थे। उन्होंने इन्हें अपने नौ रत्नों में शामिल कर लिया। अकबर के दरबार में रहते हुए तानसेन विश्व के कौने-कौने में प्रसिद्ध हो गए। कहते है के तानसेन के संगीत के प्रभाव से पत्थर पिघल जाते थे, दीपक जल जाते थे तथा पशु-पक्षी भी अपनी सुध-बुध खो देते थे। 

4. संगीत जगत को देन: 
(i) तानसेन जी ने अनेक ध्रुपदों की रचना की और उन्हें गाया भी।  
(ii) तानसेन जी रबाब नामक वाद्य बजाने मे भी कुशल थे। उन्हें भैरव राग में विशेष सिद्धि प्राप्त थी। 
(iii) उन्होंने कई रागो की स्थापना की जैसे:- मिया मल्हार, मिया की तौडी, दरबारी कान्हाडा, मियाँ की सारंग।
(iv) उन्होंने वीणा और सितार के आधार पर सुर बहार नामक वाद्यों की रचना की। 
(v) आपके लिखे ग्रंथ है-
     राग माला, संगीत सार, श्री गणेश स्तोत्र 

 

Tuesday, 11 March 2025

सप्तक Saptak definition in music

 सप्तक 

सात स्वरों के समूह को जब एक क्रम से गाया अथवा बजाया जाता है तो उसे सप्तक कहते है स, रे, ग, म, प, ध और नी। एक सप्तक स से नी तक होता है। नी के बाद जो स आता है, वहाँ से दूसरा सप्तक आरंभ होता है। यह सप्तक पहले सप्तक मे आए स से दुगुना ऊँचा होता है। सप्तक तीन प्रकार होता है -

1. मंद्र सप्तक:- साधारण आवाज से दोगुनी नीची आवाज मे गाया जाए, वह मंद्र सप्तक कहलाता है। इस सप्तक की आवाज नीची और गंभीर होती है। इस आवाज को गाने में हृदय पर जोर पड़ता है। पं. भातखंडे स्वर लिपि पद्धति के अनुसार मंद्र सप्तक के स्वरो को नीच बिंदु लगाया जाता है। जैसे: ग़, म़, प़, ध़, ऩि

2. मध्य सप्तक:- जिस सप्तक के स्वरो की आवाज साधारण बोलचाल जैसी होती है, उसे मध्य सप्तक कहते है। यह आवाज न अधिक नीची और न ही अधिक ऊँची होती है। इस की पहचान के लिए कोई भी चिन्ह का प्रयोग नहीं होता। जैसे: स, रे, ग, म, प, ध, नी

3. तार सप्तक:- मध्य सप्तक से दुगुनी ऊँची आवाज से बजाया जाने वाला सप्तक, तार सप्तक कहलाता है। इस सप्तक के स्वरों को गाने से मष्तिष्क पर जोर पड़ता है। स्वरों की पहचान के लिए स्वरो के ऊपर बिंदी का प्रयोग किया जाता है। जैसे: सं, रें, गं, मं।

Saturday, 8 March 2025

स्वर Swar definition in music

 स्वर 

सप्तक की बाइस (22) श्रुतियों में से चुनी गई सात (7) श्रुतियाँ जो सुनने में मधुर है, जो एक-दूसरे से काफी अंतर पर रखी गई है और किसी राग विशेष में प्रयोग होती है, स्वर कहलाती है। स्वर और श्रुति में इतना ही अंतर है, जितना साँप और उसकी कुण्डली मे।

पं. अहोबल के अनुसार वह आवाज जो अपने-आप ही सुनने वाले के चित्त (मन) को आकर्षित करती है, वे स्वर कहलाती है। 

पं. शारंगदेव के ग्रंथ ‘संगीत रत्नाकर’ में स्वर का भावार्थ यह है कि श्रुति के पश्चात तुरंत उत्पन्न होने नाद (आवाज़) जो सुनने वाले के चित्त को रंजन कर सकता है। वह स्वर कहलाता है। 

स्वर संख्या: हमारे संगीतकारों ने 22 श्रुतियों में से 12 स्वर चुन कर अपना गायन शुरू किया। इन्हीं 12 स्वरो में से सात 7 शुद्ध और पाँच 5 विकृत स्वर माने गये है। 

स्वरों के रूप:
1. शुद्ध स्वर- जब स्वर नियमित स्थान पर स्थित होते है, उनको शुद्ध स्वर कहते है। जैसे: स, रे, ग, म, प, ध, नि। इन सात स्वरों मे से  स, प अचल स्वर है क्योंकि यह अपने स्थान से कभी भी नही हटते। इनके दो रूप नहीं होते। 

2. विकृत स्वर- रे, ग, म, ध, नि ये विकृत स्वर है। ये अपने नियत स्थान से ऊँचे या नीचे किए जा सकते है। 

3. कोमल स्वर- रे, न, ध, नि इन स्वरो के नीचे एक रेका (खींच दी जाती है।) खींची जाती है। ये स्वर अपने नियमित स्थान (से नीचे किए जाते है।) पर प्रयोग किए जाते है।

4. तीव्र स्वर- जब शुद्ध मध्यम स्वर को उसके नियत स्थान से ऊँचा किया जाता है तो तीव्र माध्यम बजता है। इसको पहचानने के लिए म के ऊपर खड़ी रेखा लगा देते है। इस प्रकार सप्तक के कुल 12 स्वर भारतीय संगीत का आधार है।

Friday, 7 March 2025

श्रुति Shruti definition in music

 श्रुति 

श्रुति संस्कृत का शब्द है। ये ‘श्रु’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है सुनना। श्रुति का शाब्दिक अर्थ श्रुयेते + इति =श्रुति अर्थात जो कानों द्वारा साफ सुना जा सके, वे श्रुति है। संगीत में हम हर सुनने वाली आवाज को श्रुति नहीं कह सकते क्योंकि संगीत में हम उसी आवाज की कल्पना कर सकते है जो संगीत उपयोगी है।  
          ‘अभिनव राग मंजरी’ नामक ग्रंथ में श्रुति की जो परिभाषा दी गई है, उसका अर्थ है – ‘जो आवाज गीत में प्रयोग की जा सके और एक-दूसरे से साफ़/अलग और स्पष्ट पहचानी जा सके उसको श्रुति कहते है। 
            श्रुतियाँ भारतीय स्वर सप्तक का मूल आधार है। श्रुतियों के आधार पर स्वरों की स्थापना करने के सिद्धांत को सभी मानते हैं। 

श्रुतियों की संख्या 22 है।  हमारे प्रचीन, मध्य कालीन और आधुनिक ग्रन्थकारो ने 22 श्रुतियाँ मानी है। श्रुतियों के नाम हैं- तीव्रा, रंजनी, दयावती, या, और संदीपन आदि।

अतः हम ये कह सकते है कि श्रुति भारतीय संगीत की आत्मा है।श्रुति के बाद उत्पन्न होने वाला मधुर तथा रंजन करने वाला नाध स्वर कहलाता है। स्वर राग का जनक है और आत्माभि व्यक्ति का साधन है।
            
               

Marketing Research Process Procedure

 Q. Explain the procedure of conducting marketing research .  Ans. Marketing research process consists a sequence of several steps, these st...